राजद के पूर्व जिलाध्यक्ष व विधायक सुरेश मेहता ने पार्टी छोड़ी, भाजपा का दामन थामा। औरंगाबाद में नए राजनीतिक समीकरण बनने के संकेत।
(रिपोर्ट- राजेश रंजन)
औरंगाबाद। बिहार की राजनीति में महागठबंधन को उस समय बड़ा झटका लगा जब जिले के वरिष्ठ कुशवाहा नेता और पूर्व विधायक सुरेश मेहता ने पार्टी से नाता तोड़ते हुए एनडीए का दामन थाम लिया। बुधवार को उन्होंने पूर्व राज्यसभा सांसद गोपाल नारायण सिंह के साथ संयुक्त प्रेस वार्ता कर अपने निर्णय की घोषणा की।
अब वे भाजपा उम्मीदवार त्रिविक्रम नारायण सिंह के समर्थन में सक्रिय रहेंगे।
क्यों छोड़ी राजद?
मेहता ने बताया कि उप मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के पिता शकुनी चौधरी उनके राजनीतिक मार्गदर्शक रहे हैं, जिन्होंने उन्हें लालू प्रसाद यादव की पार्टी में शामिल कराया था।
उन्होंने कहा कि 2000 में शकुनी चौधरी के प्रयास से उन्हें टिकट मिला और वे विधायक बने। दो बार हार के बावजूद वे पार्टी के साथ बने रहे और 2020 के विधानसभा चुनाव में राजद जिलाध्यक्ष के रूप में अहम भूमिका निभाई।
उस चुनाव में औरंगाबाद जिले की सभी छह सीटें महागठबंधन के खाते में गई थीं।
मेहता ने कहा कि पार्टी में लगातार उपेक्षा के कारण वे निराश थे। बावजूद इसके, उन्होंने संगठन को मजबूत करने में कोई कमी नहीं रखी। आखिरकार उन्होंने भाजपा में जाने का फैसला किया।
भाजपा में मिली नई जिम्मेदारी
भाजपा में शामिल होने के बाद सुरेश मेहता को औरंगाबाद विधानसभा क्षेत्र में एनडीए उम्मीदवार को जीत दिलाने की जिम्मेदारी सौंपी गई है।
उन्होंने कहा कि वे भाजपा की नीतियों से प्रभावित हैं और पूरी निष्ठा के साथ एनडीए के पक्ष में काम करेंगे।
राजनीतिक समीकरण में नया मोड़
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सुरेश मेहता का औरंगाबाद क्षेत्र में कुशवाहा समाज के साथ-साथ पिछड़े और अति पिछड़े वर्गों में भी प्रभाव है।
उनके भाजपा में आने से चुनावी समीकरणों में बदलाव की संभावना जताई जा रही है।
विशेषज्ञों के अनुसार, भाजपा ने यह कदम राजद सांसद अभय कुशवाहा के प्रभाव को संतुलित करने के लिए उठाया है।
ऐसे में “सुरेश मेहता फैक्टर” आगामी विधानसभा चुनाव में निर्णायक भूमिका निभा सकता है।



